यह मेरे ब्लॉग का तीसरा पोस्ट है। मैं इस पोस्ट में सफलता की सीढ़ी की दूसरे स्टेप की बात करना चाहता था, लेकिन लिखते-लिखते मुझे यह महसूस हुआ कि शायद मुझे पहले उस ढाई अक्षर के शब्द पर ही थोड़ा और ठहरना चाहिए — ध्यान।
शब्द छोटा है, लेकिन इसकी गहराई बहुत बड़ी है। जितना यह छोटा दिखता है, उतना ही यह हमारे भीतर उतर जाता है।
अगर मैं जीवन को कच्ची मिट्टी मान लूं और मन को लकड़ी, तो सबसे पहले हमें इस मन रूपी लकड़ी को एक सांचे में बदलना होगा। क्योंकि जब तक सांचा नहीं बनेगा, तब तक हम अपने जीवन को मनचाहा आकार नहीं दे सकते। अभी हमारी स्थिति यह है कि हम बिना किसी सांचे के ही जीवन को आकार देने की कोशिश कर रहे हैं। शायद यही वजह है कि हम बार-बार जीवन के अलग-अलग क्षेत्रों में असफलता का सामना करते हैं।
जब आप ध्यान में आते हैं, तो धीरे-धीरे यह सांचा बनना शुरू होता है। गहराई में जाना तो दूर की बात है, आप सिर्फ 5 मिनट, 10 मिनट, 15 मिनट या आधा घंटा ध्यान करना शुरू कर दीजिए। जैसे-जैसे समय बढ़ेगा, वैसे-वैसे आपका मन साफ होता जाएगा। चीजें आपको पहले से ज्यादा स्पष्ट दिखने लगेंगी। जिन बातों में पहले उलझन होती थी, वे धीरे-धीरे सुलझने लगेंगी।
ध्यान के साथ एक और चीज होती है — आपको जीवन में संकेत मिलने लगते हैं। अब यह संकेत क्या होते हैं, इसे मैं अपने जीवन के एक छोटे से उदाहरण से समझाना चाहता हूं।
एक समय ऐसा था जब मैं खुद परेशानियों से गुजर रहा था। मैंने सफलता पाने के कई तरीके अपनाए, कई रास्ते फॉलो किए, लेकिन एक वक्त के बाद मन में यही आता था कि शायद मेरे जीवन में कुछ नहीं हो सकता।
फिर मैंने ध्यान करना शुरू किया। कोई खास विधि नहीं, बस बैठना शुरू किया। धीरे-धीरे मन थोड़ा शांत होने लगा, डर कम होने लगा। सबसे बड़ी बात यह हुई कि जो डर पहले भीतर जकड़ा रहता था, उसका सामना करने की हिम्मत आने लगी।
एक दिन मैं अपनी गाड़ी से बाजार की तरफ जा रहा था। दिमाग में वही सवाल चल रहे थे कि आगे क्या होगा, जो समस्याएँ चल रही हैं उनका हल निकलेगा या नहीं। उसी दौरान मैं एक मंदिर के सामने से गुजरा और अंदर भजन चल रहा था, जिसके बोल थे – “तेरा राम जी करेंगे बेड़ा पार, उदासी मन काहे को डरे।”
ऐसा नहीं है कि मैं पहली बार उस मंदिर के सामने से निकला था। इससे पहले भी मैं सैकड़ों बार अलग-अलग मंदिरों के सामने से गुजरा हूं। हो सकता है यह भजन मैंने पहले भी कई बार सुना हो, लेकिन कभी उस पर ध्यान नहीं दिया।
उस दिन फर्क सिर्फ इतना था कि मेरा मन एक सवाल में डूबा हुआ था। और शायद उसी वजह से उस दिन मैंने सिर्फ भजन नहीं सुना, बल्कि उसके शब्दों पर ध्यान दिया। उस पल मुझे ऐसा लगा जैसे मेरे मन के सवाल का उत्तर मुझे मिल गया हो। किसी के लिए यह बस एक इत्तेफाक हो सकता है, लेकिन मेरे लिए वह एक साफ संकेत था।
यहाँ मैं साफ करना चाहता हूं कि जब मैं असफलता की बात करता हूं, तो उसका मतलब सिर्फ पैसे, बिजनेस या काम से नहीं है। आप किसी भी स्थिति में हो सकते हैं — पारिवारिक समस्या, मानसिक परेशानी, शारीरिक तकलीफ या कोई बीमारी। ध्यान हर स्तर पर अपना असर दिखाता है। ध्यान आपको आपसे मिलाता है। ध्यान आपको यह समझने में मदद करता है कि आप कहां सही हैं और कहां गलत।
कई बार हम बस जी रहे होते हैं, यह सोचकर कि हम सब कुछ सही कर रहे हैं। लेकिन जब आप ध्यान में आते हैं, तब ध्यान आपको आपकी गलतियों से भी मिलवाता है। यह आसान नहीं होता, लेकिन यही जरूरी होता है।
सकारात्मक सोच की बातें हम सभी सुनते हैं, लेकिन जब जीवन में लगातार कुछ ठीक न हो रहा हो, तो लाख कोशिश के बाद भी सकारात्मक रहना मुश्किल होता है।
ध्यान में आने पर दिमाग धीरे-धीरे खाली होना शुरू होता है। और जब दिमाग खाली होता है, तब नई बातें उसमें जगह बना पाती हैं। पुराने पैटर्न बदलने में समय लगता है, लेकिन समय तो वैसे भी गुजर ही रहा है।
आप मानें या न मानें, आज से दो-तीन साल बाद समय उतना ही आगे निकल चुका होगा। फर्क सिर्फ इतना होगा कि आपने उस समय के साथ क्या किया।
सिर्फ सोचते रहने से कुछ नहीं बदलता। एक छोटा सा कदम उठाना पड़ता है।
हर दिन अपने जीवन के 15-20 मिनट खुद को दीजिए। बस बैठिए, आंखें बंद कीजिए, खुद को देखिए। यही ध्यान है।
बाकी जीवन की उथल-पुथल तो चलती ही रहेगी।
ध्यान पर अब बस इतना ही।
अगले पोस्ट में हम सफलता की सीढ़ी के अगले स्टेप पर बात करेंगे।
क्रम जारी रहेगा… (To be continued)

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